तुम मिली।अशेषसभी कामनाएँ।मेरी दृष्टि मेंअब कोई क्षितिज नहीं।थोड़ा ठहर मेरी महबूब!वो बारिश भीन लेने दे।हर्फ सूख तो लेंजो खतूत फिर से लिखें।वो ठिठुरन अभी तक हैसाँसों की सरगमदुश्वारियाँ ...
आज भीतर बाहर जूझते
वह सुबहें याद आई हैं -
जब पृथ्वी पर होते थे
बस मैं और तुम जीवित।
सब कुछ सिमटा था बस दो साँसों के बीच
होठों पर नहीं, नथुनों में थे चन्द शब्द
उनके उच्चारण एक ही थे - ...
भाग 1 , भाग 2, भाग 3, भाग 4, भाग 5, भाग 6, भाग 7, भाग 8, भाग 9, भाग 10, भाग 11, भाग 12, भाग 13,भाग 14 , भाग 15, भाग 16, भाग 17, भाग 18, भाग 19 से जारी ...
ठिठुरती ब्राह्मबेला में तुम्हारी ...
बाबूलाल जांगीड की पान की दुकान घर से अदालत के रास्ते में मिडवे है। रोज सुबह वहाँ रुकना, पान खाना और दिन के लिए बंधवाना। इस बीच वहाँ कुछ और लोगों से बात होती है। वहीं एक और बाबू मिलता है। बाबू में ...
भाग 1 , भाग 2, भाग 3, भाग 4, भाग 5, भाग 6, भाग 7, भाग 8, भाग 9, भाग 10, भाग 11, भाग 12, भाग 13,भाग 14 , भाग 15, भाग 16, भाग 17 से जारी ... बाद में पता चला कि उस दिन अंट शंट बकते एक मेहतर को ...
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ऊर्मि! इस पत्र में कुछ बातें बस यूँ ही कहता चल रहा हूँ। इसे बतरस ...